सैनिक की वीरगति
माँ!मुझे न कर्ज चुकाना है,
तेरी गोद में सर रख मर जाना है।
जब मेरी हल्की सी जान अटकी हो,
मेरे मन में कोई बात न शेष खटकी हो।
तब तू मुझे अपनी आंचल से होंके,
और जान निकले इस शीतल झोंके।
हाँ,माँ एक बात और बताना है,
तुझे पता है,एक वीर चक्र अपने घर आना है।
उसे घर के हाॅल में सजाना,
पर मेरी फोटो साथ न लगाना।
सही समय पर खा लूँगा खाना,
फोन कर वहां न धमकाना।
इस वीरता के समर में,
होने जा रहा अमर मैं।
खुद की लगाकर आरती,
सुरक्षित कर रहा हूँ,माँ भारती।
पापा!आपका भी कुछ चुकाया नहीं,
पर देश का भी मुझ पर कोई बकाया नहीं।
जानता हूँ सहना कष्ट थोड़ा कठिन होगा,
पर गर्व भी मुझ पर तनिक तो जरूर होगा।
चला मैं अब शून्य की ओर,
खुश रहना आप सब भूलकर,जैसे हो
हर रोज़ की तरह कोई नई भोर।
---शिवम
Shivam49mp@gmail.com
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